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आयकर विभाग का पूरा केस हुआ खारिज, वजह जानकर रह जाएंगे हैरान

Ratna Netam
6 Aug 2026 5:39 PM IST
आयकर विभाग का पूरा केस हुआ खारिज, वजह जानकर रह जाएंगे हैरान
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नई दिल्ली : आमतौर पर यदि कोई व्यक्ति अपने बैंक खाते में करोड़ों रुपये नकद जमा कराए और आयकर रिटर्न (ITR) भी दाखिल न करे, तो उसके खिलाफ आयकर विभाग की कार्रवाई लगभग तय मानी जाती है। लेकिन कर्नाटक के मैसूर के एक रिटायर्ड शिक्षक के मामले में ऐसा नहीं हुआ। बैंक खाते में करीब 1.33 करोड़ रुपये नकद जमा होने और आईटीआर दाखिल नहीं करने के बावजूद आखिरकार आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (ITAT), बेंगलुरु ने शिक्षक के पक्ष में फैसला सुनाया और आयकर विभाग की पूरी कार्रवाई को निरस्त कर दिया। खास बात यह रही कि यह राहत नकदी के स्रोत को सही मानने के कारण नहीं, बल्कि विभाग की एक कानूनी चूक की वजह से मिली।
यह मामला आकलन वर्ष 2015-16 का है। मैसूर निवासी रिटायर्ड शिक्षक मारथिक्यथानहल्ली ने उस वित्तीय वर्ष के दौरान अपने बैंक खाते में लगभग 1.33 करोड़ रुपये नकद जमा कराए थे। उन्होंने उस वर्ष का आयकर रिटर्न दाखिल नहीं किया था। इतनी बड़ी नकद जमा राशि को देखते हुए केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) के रिस्क मैनेजमेंट स्ट्रैटेजी (RMS) सिस्टम ने इस लेनदेन को संदिग्ध मानते हुए आयकर विभाग को अलर्ट जारी किया।
आयकर विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार शिक्षक की मुख्य आय कृषि और बचत खाते पर मिलने वाले ब्याज से थी। ऐसे में बैंक खाते में अचानक इतनी बड़ी नकद राशि जमा होने से विभाग को शक हुआ कि यह अघोषित आय हो सकती है। इसी आधार पर विभाग ने मामले की जांच शुरू की।
26 मार्च 2022 को आयकर विभाग ने आयकर अधिनियम की धारा 148A(b) के तहत पहला नोटिस जारी किया और शिक्षक से स्पष्टीकरण मांगा। हालांकि शिक्षक ने इस नोटिस का कोई जवाब नहीं दिया। इसके बाद 26 अप्रैल 2022 को आकलन अधिकारी (Assessing Officer) ने धारा 148A(d) के तहत आदेश जारी करते हुए धारा 148 का नोटिस भेजा और आयकर रिटर्न दाखिल करने को कहा।
शिक्षक ने बाद में रिटर्न तो दाखिल किया, लेकिन उसका ई-वेरिफिकेशन नहीं कराया। ई-वेरिफिकेशन न होने के कारण वह रिटर्न वैध नहीं माना गया। इसके बाद विभाग ने कई अन्य नोटिस जारी किए और अंततः धारा 147 एवं 144 के तहत पुनर्मूल्यांकन (Reassessment) करते हुए उनकी कुल आय 48.85 लाख रुपये निर्धारित कर दी। इसमें से 48.73 लाख रुपये को अघोषित आय मानते हुए उस पर टैक्स लगाने का आदेश दिया गया।
इस आदेश के खिलाफ शिक्षक ने सबसे पहले आयकर आयुक्त (अपील) यानी CIT(A) के समक्ष अपील की, लेकिन वहां उन्हें कोई राहत नहीं मिली। इसके बाद मामला बेंगलुरु स्थित आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (ITAT) पहुंचा।
ITAT में शिक्षक के वकीलों ने विभाग की कार्रवाई की वैधता पर सवाल उठाया। उन्होंने दलील दी कि आयकर विभाग ने धारा 148 का नोटिस कानून में निर्धारित समय सीमा समाप्त होने के 26 दिन बाद जारी किया था। पुराने प्रावधानों के अनुसार आकलन वर्ष 2015-16 के लिए नोटिस जारी करने की अंतिम तारीख 31 मार्च 2022 थी। कोविड संबंधी प्रक्रियात्मक छूट जोड़ने के बाद भी अधिकतम 12 अप्रैल 2022 तक ही नोटिस जारी किया जा सकता था, लेकिन विभाग ने नोटिस 26 अप्रैल 2022 को जारी किया।
ITAT ने इस दलील को स्वीकार करते हुए कहा कि जब मूल नोटिस ही समय सीमा के बाद जारी हुआ है, तो उसके आधार पर की गई पूरी पुनर्मूल्यांकन प्रक्रिया कानून की नजर में अमान्य हो जाती है। ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट किया कि धारा 148A की प्रक्रिया अपनाने से नोटिस जारी करने की कानूनी समय-सीमा समाप्त नहीं हो जाती। यदि नोटिस तय समय के बाद जारी किया गया है, तो उसके बाद की सारी कार्रवाई स्वतः निरस्त मानी जाएगी।
अपने फैसले में ITAT ने सुप्रीम कोर्ट के **राजीव बंसल** मामले और कर्नाटक हाईकोर्ट के **मोहम्मद यासीन** मामले का भी हवाला दिया। न्यायाधिकरण ने कहा कि जहां पुराने कानून के तहत नोटिस जारी करने की समय-सीमा समाप्त हो चुकी हो, वहां नए प्रावधानों का सहारा लेकर विभाग दोबारा मामला नहीं खोल सकता।
यह फैसला करदाताओं के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी संदेश भी देता है। इससे स्पष्ट होता है कि आयकर विभाग को भी कानून में तय प्रक्रियाओं और समय-सीमा का सख्ती से पालन करना होगा। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इस फैसले का यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि बड़ी नकद राशि जमा करने या आईटीआर दाखिल न करने पर कार्रवाई नहीं होगी। यदि विभाग निर्धारित समय के भीतर सही प्रक्रिया का पालन करता है, तो वह जांच और कर वसूली की कार्रवाई पूरी तरह कर सकता है। इस मामले में केवल 26 दिनों की देरी ने पूरे केस की दिशा बदल दी और रिटायर्ड शिक्षक को बड़ी कानूनी राहत मिल गई।
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